Monday, 14 November 2016


हे परम् पूज्य श्रद्देय संत सद्गुरु


हे परम् पूज्य श्रद्देय संत सद्गुरु तुम्हको सत सत प्रणाम।
हे विधि हरि हर स्वरूप सद्गुरु तुम्हको मेरा सत सत प्रणाम।
हे वन्दनीय ! हे अर्चनीय ! मानक तन में साक्षात  ब्रह्म।
चेतना ज्ञान मय मूर्ति तुम्ही अंतर्हित प्रज्ञा दिव्य धाम।
"साहित्य साधना" के दाता ज्ञाता सच्चा सद्गुरु कौन।
साधक संजीवनी वटी तथा गीता प्रबोधिनी कृति ललाम।
"सुंदर समाज" अरु "सत्य खोज" "वास्तविक सुख" पुस्तक तमाम।
साहित्य ह्रदय उर दिव्य ज्ञान साधन साध्य विख्यात नाम।
अध्यात्म जगत के सत्यवान गीता गायक मानस  प्रेमी।
सत असत व्यक्त अव्यक्त देव सब तुझमे देखें छविललाम।
गोरखपुर गीता  प्रेस देश भारत के रत्न महान संत।
साधना क्षेत्र हरिद्धार   परम पावन आश्रम ऋषिकेष धाम।
मम इच्छा गुरु मम शिक्षा गुरु प्रेरणा श्रोत दे दिव्यज्ञान।
हुये ब्रह्म लीन तारीख तीन था मास जुलाई दो दशक पांच।
दर्शन तो पाये  नहीं मगर आशीष दे गए परम  धाम।
हे परम पूज्य श्रद्धेय सन्त सद्गुरु तुमको शत शत प्रणाम।


about my guru "Late shri ram sukh das ji" 

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