गुरु ही मातु पिता प्रिय बंधू
सद्गुरु परम् तत्व दर्शाई !
गुरु ही भुक्ति मुक्ति के दाता , गुरु में दे भगवान दिखाई !गुरु ही मातु पिता प्रिय बंधू गुरु हरि हर विधि रूप सहाई !
अमिय दृष्टि करुणा के सागर अति उदार समरथ प्रभुताई !
सत्यं शिवं सुंदरं सद्गुरु आनंदघन शीतल अमराई !
भक्ति भाव में रंग दिव्य मन सद्गुरु दे भ्रम भेद मिटाई !
गुरु अविनाशी अलख निरंजन पावन परम सुर सरी नाई !
पारस स्वर्ण करत लोहे को तो देइ बनाई !
संसृति क्लेश लेश नहि सालत जन्म मरण बंधन कटि जाई !
"निर्भय" आत्म स्वरूप विचारत जानत तुम्हहि तुम्हहि दुई जाई !!

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