Tuesday, 15 November 2016

गुरु ही मातु पिता प्रिय बंधू

गुरु ही मातु पिता प्रिय बंधू

सद्गुरु परम् तत्व दर्शाई !
गुरु ही भुक्ति मुक्ति के दाता , गुरु  में दे भगवान दिखाई !
गुरु ही मातु पिता प्रिय बंधू गुरु हरि हर विधि रूप सहाई !
अमिय दृष्टि करुणा के सागर अति उदार समरथ  प्रभुताई !
सत्यं शिवं  सुंदरं  सद्गुरु आनंदघन शीतल अमराई !
भक्ति भाव में रंग दिव्य मन सद्गुरु दे भ्रम भेद मिटाई !
गुरु अविनाशी अलख निरंजन पावन परम सुर सरी  नाई !
पारस स्वर्ण करत लोहे को  तो देइ बनाई !
संसृति क्लेश लेश नहि  सालत  जन्म मरण बंधन कटि  जाई !
"निर्भय" आत्म स्वरूप विचारत जानत तुम्हहि तुम्हहि दुई  जाई !!

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