Friday, 4 November 2016

शिव स्तुति




 

शिव स्तुति 

 

 

कृपा करहु शिव शंकर गौरी। 

 

तुमसे आश बहुत है मोको विनय सुनै शिव मोरी। 

 

घर बाहर के लोग स्वार्थी चाहत हमै  निचोरी। 

     शुत बनितादि बंधु परिवारी सबै सदा झकझोरी। 

जथा लाभ संतोष न करहुँ सब तन है बरजोरी।     

मोरे तोरे की छिड़ी लड़ाई विष बोवत है होरी।  

संतति हित चाहत पितु माता सदा बनाई हिट कौरी। 

खालि  के पूत सपूत न रकौ  छिनत मुख से कौरी।

पर निंदक बहु तेरे जगत में हरि चिंतक दुई ठौरी। 

दया धर्म करुणा नहि तनिकौ क्र कठोर करोरी। 

खह लगि कहाँ विपति निज पनकी जानत हौ प्रभु मोरी।

'निर्भय' बाँह पकड़ लो मेरी शरण तेरी शिव गौरी। 

  

      

                  

     

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